रंजन गोगोई के राज्यसभा मनोनयन पर सवाल तो उठेगा !

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है. आदेश जारी होते ही कांग्रेस पार्टी समेत तमाम विपक्षी दलों ने हायतौबा मचाना शुरू कर दिया. गौरतलब है कि रंजन गोगोई उन चार जजों में से एक हैं, जिन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ तीन अन्य जजों के साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी.

रंजन गोगोई के राज्यसभा मनोनयन पर तमाम सवाल उठाए जाने लगे हैं. कहा जा रहा है कि रंजन गोगोई को अपने कार्यकाल के दौरान सरकार के पक्ष में कई फैसले सुनाने पर ईनाम में राज्य सभा की सांसदी मिली है.

साल 2012 में भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने कहा था कि किसी जज को रिटायर होने के दो साल बाद ही कोई और सरकारी काम या पद दिया जाना चाहिए. उन्होंने साफ़ कहा था कि इन पदों की चाहत न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रभाव डालती है. रंजन गोगोई से पहले अगस्त में दिल्ली हाई कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस सुनील गौड़ Tribunal for Prevention of Money Laundering Act के अध्यक्ष बना दिए गए. उन्होंने रिटायर होने से तीन दिन पहले पी चिदम्बरम की ज़मानत याचिका ख़ारिज की थी. एक महीने बाद ही उन्होंने पद संभाल लिया. इस टाइमलाइन की वजह से विवाद खड़ा हुआ.

हालांकि ऐसा नही है कि यह पहली बार हुआ है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व मुख्य न्यायधीश रंगनाथ मिश्रा को कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा था. 1950 के बाद से 44 मुख्य न्यायाधीशों को रिटायरमेंट के बाद कोई पद मिला है. सुप्रीम कोर्ट के कई रिटायर्ड जजों को किसी आयोग का मुखिया बनाया गया.

पहले लॉ कमीशन ने तो सुझाव दिया था कि किसी बड़ी अदालतों के जज को रिटायरमेंट के बाद कोई पद नहीं स्वीकारना चाहिए. एक वरिष्ठ पत्रकार का भी यही मानना है कि किसी एक जज के ऐसे पद स्वीकार करने के बाद उसके साथ-साथ सम्पूर्ण न्यायपालिका पर सवालिया निशान लग जाते हैं.

अब देखने वाली बात होगी कि विपक्षी पार्टियाँ इस मनोनयन के मामले को कितना लंबा खींचती हैं. क्या-क्या कीचड़ उछाली जाति है? लेकिन इतना तो तय है कि अब इस मनोनयन के बाद हाई और सुप्रीम कोर्ट के सरकार के पक्ष के प्रत्येक फैसले को शक की नजरों से देखा जाएगा. और माननीय जज साहब के लिए कहा जाएगा कि इनको भी रिटायर होने के बाद कोई पद चाहिए.

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