काश YES बैंक सही वक़्त पर लेनदारों को ‘NO’ कहता

  • काश YES बैंक सही वक़्त पर लेनदारों को ‘NO’ कहता
para serbit Vejvoda


कहा जाता है कि पैसे बचाओ और बैंक में जमा करो. जरुरत के वक़्त वही काम आएंगे. लेकिन सोचो आपने अपनी मेहनत की कमाई में से बचाकर बैंक में जमा किया. आपको कभी पैसों की जरुरत पड़े और आप अपने बैंक जाते हैं. वहां आपको पता लगता है कि आप एक महीने में 50,000 रुपए से ज्यादा निकाल ही नहीं सकते. जबकि आपके खाते में इससे ज्यादा ही रकम है. आपको कैसा लगेगा? आपको अपनी बचत के पैसों को लेने से मना कर दिया जाए. आपको कैसा एहसासा होगा? और यही हुआ है यस बैंक के खाताधारकों के साथ.
इस वक़्त यही आफत यस बैंक के ग्राहकों पर आन पड़ी है. यस बैंक काफी दिनों से क्रेडिट के संकट से गुजर रहा था. रिजर्व बैंक ने 5 मार्च को यस बैंक के बोर्ड को भंग कर दिया और खाताधारकों पर कुछ बंदिशें लगा दीं. अगले एक महीने तक यस बैंक के खाताधारक सिर्फ 50,000 रुपए ही निकाल पाएंगे. साथ ही रिजर्व बैंक ने नया प्रशासक भी नियुक्त किया है. रिजर्व बैंक के इस ऐलान के बाद से ही यस बैंक के ग्राहकों पर संकट का पहाड़ टूट गया है. हालांकि अब रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि वो एक महीने में यस बैंक को संकट से उबारने के लिए प्लान लेकर आएंगे और इन सब में धाताधारकों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा.
अब सवाल उठता है कि एक समय सबसे भरोसेमंद प्राइवेट बैंकों में से एक यस बैंक के साथ ऐसा क्या तिकड़म हो गया कि आज उसके ये दिन आ गए? क्यों आज उसके संस्थापकों को ही उसकी संपत्ति से हटा दिया गया? क्यों उसके ग्राहकों को पैसे निकालने पर लिमिट का ध्यान रखना पड़ रहा है? तो इसका सीधा-साधा जवाब है कि सही तरीके वित्तीय लेनदेन न करना. बैंक ने दबा के कम्पनियों को लोन बांटे. लोन लेने वाले लोन लेते गए, और बैंक भी उन्हें देता गया. कोई ध्यान नही रखा गया. बैंक ने कई ऐसी कंपनियों को लोन बांटे, जिनके वित्तीय रिकॉर्ड में झोल थे. यस बैंक ने कैफे कॉफ़ी डे, जेट एयरवेज, दीवान हाउसिंग जैसी कंगाल कंपनियों को दबा के लोन बांटे. और एकबार लेनदारों ने पैसे लिए, लेकिन लौटने का नाम नहीं लिया. धीरे-धीरे ऐसी ही रकम बढती गई, और यस बैंक बर्बादी की कगार पर जाता गया. अगर बैंक का प्रबन्धन वक़्त रहते चेत जाता तो आरबीआई को यह फैसला नहीं लेना पड़ता. अगर यस बैंक सही समय पर सही लोगों को ‘नो’ कहता तो आज उसके ग्राहकों को ‘नो’ न कहना पड़ता.

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